Barabanki News… प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मीडिया सर्किल में इन दिनों एक ऐसी खबर गोते खा रही है, जिससे जिले का सियासी पारा तो बढ़ने वाला है ही। साथ ही इससे जिले में चुनाव लड़ने की जुगत में लगे कई मुस्लिम उम्मीदवारों को भी झटका लग सकता है। हालांकि इस खबर की कोई पुष्टि नहीं है, ये मात्र कयास भी हो सकता है, लेकिन सियासी पुलाव पकाने की शुरूआत कयासों से ही होती है। इसलिए इसे नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
दरअसल लखनऊ के मीडिया सर्किल में इन दिनों समाजवादी पार्टी से जुड़ी एक खबर तेजी से आम हो रही है। इस खबर के मुताबिक बीएसपी से वाया कांग्रेस में इम्पोर्ट हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी को सपा कुर्सी विधानसभा से अपना उम्मीदवार बना सकती है। ये खबर आम है। हालांकि इसकी आगे इस बात की कोई कयास आराई नहीं है कि जिले की छह सीटों पर किसको उम्मीदवार बनाया जाएगा। इसकी वजह से सस्पेंस में इजाफा हो जाता है।
आपको बता दें कि सपा जिले में अपने नेताओं को उम्मीदवार बनाने के लिए नए-नए प्रयोग करती रही है। पिछली बार भी सपा ने अपने उम्मीदवारों को ताश की गड्डी की तरह फेंटा था और जो जहां से तैयारी कर रहा था। उसे वहां से टिकट नहीं दिया गया था। तो अगर इस बार भी सपा कुछ नया करती है, तो कोई नई बात नहीं होगी। वैसे भी कांग्रेस में रहते हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी कुर्सी विधानसभा से अपने लिए अवसर तलाश रहे थे। क्यूंकि संभावित गठबंधन की वजह से कांग्रेस से उनकी सियासी महत्वकांक्षा पूरा होना लगभग नामुमकिन ही था। शायद इसलिए ही वो सपा में गए हों। इस नजरिए से भी उपरोक्त कयासों को और कूवत मिलती है। दूसरे सपा भी आजम खान की कमी पूरी करने के लिए नसीमुद्दीन जैसे बड़े नाम को उतारकर सियासी फायदा भी लेना चाहेगी।
खैर ये अफवाह भी हो सकता है। लेकिन अगर ये खिचड़ी पकती है, तो जिले में चुनवा लड़ने की हसरत लिए बैठे मुस्लिम टिकटार्थियों को बड़ा झटका लगेगा। ये स्पष्ट है कि मौजूदा माहौल में जिले से सपा में एक से ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार को सपा उम्मीदवार नहीं बना सकती। ऐसे में उन तमाम लोगों को पार्टी के इस कदम से तगड़ा झटका लगेगा, जो लोग इन दिनों अपने-अपने क्षेत्रों में पीडीए पंचायत लगाकर टिकट हासिल करने के हसीन सपने देख रहे हैं।
इस कयास से एक सवाल सपा के अंदर और जो पैदा होता है, वो ये होता है कि जिले के एक मात्र और कद्दावर मुस्लिम विधायक फरीद महफूज का एडजेस्टमेंट। नसीमुद्दीन सिद्दीकी को टिकट देकर क्या पार्टी उन्हें भी टिकट देगी ये बड़ा सवाल है, क्यूंकि तब पार्टी के सामने जिले के दो और बड़े जनाधार वाले नेताओं को एडजेस्ट करने की चुनौती होगी। दूसरे ये कि जिले में मुस्लिम राजनीति के वट वृक्ष फरीद महफूज किदवाई को नजरअंदाज करके नसीमुद्दीन सिद्दीकी को तरजीह देने से जिले के मुस्लिमों में उपजे असंतोष को सपा कैसे काबू करेगी?
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लब-ओ-लुबाब ये कि कोई पार्टी किसको उम्मीदवार बनाती है। ये उसके आलाकमान को ही तय करना होती है। अब देखना ये है कि सपा मुखिया किसे उम्मीदवार बनाते हैं, लेकिन अगर उपरोक्त कयास अमली जामा पहनते हैं, तो कई नेताओं के अरमानों पर पानी तो फिरेगा ही, साथ ही पार्टी के लिए नई चुनौतियां भी खड़ी होंगी।

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