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Barabanki: वोटकटवा बनकर किसकी किस्मत चमकाएंगे BSP उम्मीदवार

 

Barabanki News… समाजवादियों के गढ़ माने जाने वाले जिले में भले ही आगामी विधानसभा चुनावों में सपा और बीजेपी के बीच ही मुकाबला हो, लेकिन इसके बावजूद तमाम सीटों पर वोटकटवा बनने के लिए लोग उतावले नजर आ रहे हैं। हालांकि तमाम सीटों पर अभी खुलकर वोटकटवा के तौर पर लोग खुलकर सामने नहीं आए हैं, लेकिन सदर सीट पर एक वोटकटवा के तौर पर एक एक पार्टी के उम्मीदवार का ऐलान हो गया है। अब देखना ये है कि ये वोटकटवा किसकी किस्मत चमकाते हैं? 

 प्रदेश का सियासी माहौल आज इस हाल में पहुंच चुका है कि अगर आप एक बच्चे से भी पूछेंगे कि आगामी विधानसभा चुनावों में किस-किस पार्टी के बीच मुकाबला होगा, तो जवाब यही मिलेगा, सपा और बीजेपी या इंडिया गठबंध और एनडीए। यही वजह है कि अब वो पार्टियां भी वोटकटवा की श्रेणी में आ गईं हैं, जो कभी बड़ा असर रखती थीं या सरकार तक बना चुकी हैं। इन्हीं में से एक पार्टी बीएसपी भी है। जिले में आज बीएसपी की इमेज यही बनी है, या बनाई गई है कि इसके चुनाव लड़ने से सेक्युलर ब्लॉक नुकसान होगा और इसका सीधा फायदा बीजेपी को होगा। अगर बीएसपी से उम्मीदवार मुस्लिम हो, तो ये आरोप और पुख्ता हो जाता है। यही इन दिनों जिले की सदर सीट पर हो रहा है। बीएसपी इस सीट पर मो मुबश्शिर को उम्मीदवार बनाया है। उम्मीदवार बनते ही सेक्युलर खेमे और मुसलमानों के बीच से ही सवाल उठने खड़े हो गए हैं। लोगों के सवाल काफी हद तक जाएज़ भी हैं। क्यूंकि यहां के जातीय समीकरण पूरी तरह से समाजवादी पार्टी के पक्ष में रहे हैं। यहां एम-वाई समीकरण इतना मजबूत है कि उसे अभी तक बीजेपी भी नहीं तोड़ पाई है। मोदी और योगी लहर के बावजूद यहां लगातार तीन बार से साइकिल ही फर्राराटा भरे हुए है। अब ऐसे में बीएसपी से मुबश्शिर के उम्मीदवार होने से सेक्युलर खेमे को यह लगता है कि मुस्लिम वोटों में मामूली से मामूली सेधमारी बीजेपी की जीत की बुनियाद रख देगा। ऐसे में सदर सीट पर मुबश्शिर की उम्मीदवारी सिर्फ वोटकटवा से कम नहीं मानी जा रही है। 

 वैसे भी जिले में किसी भी सीट पर बीएसपी की जीत तो दूर बीएसपी कहीं किसी को टक्कर भी दे पाएगी। इसमें भी संशय है। क्यूंकि जिले में इस वक्त बीएसपी में कोई इस कद का नेता नहीं है, जो अपने दम लोगों को आकृषित कर सके। उपेक्षा और दूसरे कारणों से जो नेता थे भी वो दूसरे दलों में चले गए। दूसरे प्रदेश स्तर पर शीर्ष नेतृत्व नजरिया स्पष्ट ना होना भी बीएसपी को जिले में टक्कर में नहीं ला पा रहा है। फैसले लेने की अक्षमता की वजह से बीएसपी कैडर का एक बड़ा हिस्सा भी अब आजाद समाज पार्टी में शिफ्ट कर चुका है।

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