Barabanki: राजनीति में संभावनाओं के साथ संयोग की भी कमी नहीं होती है। समय-समय पर राजनीति में ऐसे संयोग देखने को मिलते हैं, जिन्हें देखकर हैरानी सी होती है। जिले की सदर विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों बीजेपी में टिकट की दावेदारी को लेकर एक संयोग देखने को मिल रहा है। यहां बीजेपी से टिकट के लिए दो डॉक्टर के बीच जबरदस्त जोर आजमाइश चल रही है।
जिले के सदर सीट पर बीजेपी से टिकट के दावेदारों की कमी नहीं है। इनमें कुछ नाम तो खुलकर दावेदारी पेश कर रहे हैं और कुछ अंदर ही अंदर टिकट की जुगत में लगे हुए हैं। लेकिन इस क्षेत्र में दो डॉक्टर की टिकट के लिए जोर आजमाइश देखने योग्य है। पहले ऑपथैल्मोलॉजिस्ट हैं डॉ विवेक कुमार वर्मा और दूसरे डॉ सतीश चंद्र शर्मा। डॉ सतीश चंद्र वर्मा संकल्प टैग लाइन के साथ उम्मीदावारी की मुहिम में वहीं डॉ. विवेक लक्ष्य टैग लाइन के साथ अपने क्षेत्र को होर्डिंग से पाटे पड़े हैं। सदर सीट का शायद ही कोई खंभा या चौराहा ऐसा होगा जहां डॉ विवेक वर्मा की होर्डिंग ना हो। इस मुहिम डॉ सतीश चंद्र वर्मा भी पीछे नहीं हैं।
डॉ सतीश वर्मा की राजनीतिक इच्छाएं जागने की उम्र ज्यादा पुरानी नहीं है। वहीं डॉ विवेक वर्मा की सियासी पारी करीब 5 साल की है। डॉ विवेक वर्मा जिले और आसपास के क्षेत्र में आंख के सस्ते इलाज के लिए विख्यात हैं। 60 रुपये की फीस में आंख का इलाज, इसके साथ गरीब मजलूमों के मुफ्त में ऑपरेशन उनकी समाजिक जिंदगी की बड़ी और सराहनीय उपलब्धि है। इसी उपलब्धि को उन्होंने राजनीति के मैदान ढाल बनाते हुए 2022 में राजनीति में कदम रखा। राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए उनके पास बीएसपी के अलावा कोई विकल्प नहीं था। इसलिए उन्होंने बीएसपी के सिस्टम में ढलकर चुनाव लड़ा, लेकिन समाजिक जिंदगी की नेकियां राजनीति में काम नहीं आईं। उम्मीद से हटकर नतीजे रहे और जितने वोट हासिल हुए उनसे उन्हें राजनीति तजुर्बा जरूर हुआ होगा, लेकिन नकारात्मक परिणाम के बावजूद डॉ विवेक ने विवेक नहीं खोया और राजनीति के मैदाम में डटे रहे। जल्द ही उन्हें ये भी एहसास हो गया कि उनके विधानसभा तक पहुंचने की इच्छा बीएसपी में रहते हुए पूरी नहीं हो सकती। इसलिए उन्होंने बीजेपी की सदस्यता ले ली और लगातार बीजेपी में सक्रिय रहे। पूरे पांच साल तक डॉ विवेक वर्मा बीजेपी के हर अभियान में जी जान से लगे रहे। अपने पेशे के साथ गजब का संतुलन बनाते हुए वो बीजेपी और उसके सहयोगी हर विंग में पूरी तरह से सक्रिय नजर आए। मेले-ठेले, शादी-ब्याह और धार्मिक आयोजनों में सबसे आगे नजर आए। उन्होंने बड़े नेताओं की तरह सिर्फ भंडारों में जाकर सिर्फ खाना नहीं बांटा बल्कि भंडारों में सेवा भी की। वो कभी सब्जी काटते और कभी पूड़ी बेलते नजर आए।
वहीं डॉ सतीश वर्मा की राजनीतिक पारी लंबी नहीं है। उनकी होर्डिंग मुहिम की उम्र कोई 6-7 माह पुरानी है। पहली बार उनकी होर्डिंग उनके जन्मदिन पर लगी दिखाई दी। पहले वो सामान्य होर्डिंग लग रही थीं, लेकिन धीरे-धीरे वो उम्मीदवारी की मुहिल में परिवर्तित हो गई। अब डॉ सतीश वर्मा में होर्डिंग के मामले में किसी कम रहना नहीं चाहते हैं। शहर और आसपास के इलाकों के कई खंभों दोनों नेताओं की होर्डिंग ऊपर-नीचे तक दिख जाती हैं। चौक चौराहों पर भी यही हाल है। डॉ सतीश वर्मा संकल्प के साथ दिखाई देते हैं, तो डॉ विवेक वर्मा लक्ष्य 2027 के साथ।
अगर संयोग की बात करें,तो दोनों नेताओं में काफी संयोग हैं। दोनों डॉक्टर के साथ सजातीय हैं। दोनों ने नेत्र चिकित्सा को क्षेत्र में बड़ा नाम कमाया है। दोनों के बड़े-बड़े अस्पताल हैं और मात्र कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर हैं। अब देखना है कि इन दोनोें नेताओ में से बीजेपी का टिकट किसे हासिल होता है और हासिल होने के बाद वो सदर सीट पर विपक्षी दल के तिलिस्म को तोड़कर विधानसभा तक पहुंच पाता है या नहीं।


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