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Barabanki: क्या 2027 में प्रदेश की राजनीति में वापसी कर पाएंगे जिले के ये दोनों वर्मा परिवार?

 

मो उमैर 

Barabanki… प्रदेश की राजधानी लखनऊ से लगा बाराबंकी जिला लंबे समय से ओबीसी राजनीति का गढ़ रहा है। पिछले कई दशकों से यहां की राजनीति में दो ओबीसी परिवारों का दबदबा रहा है। दोनों परिवार कुर्मी जाति के हैं, लेकिन मोदी और योगी की लहर में ये दोनों परिवार राजनीतिक हाशिए पर हैं। हालत ये है कि बेनी प्रसाद वर्मा के वंशज और सुरेंद्र वर्मा का परिवार इन दिनों प्रदेश की राजनीति में वापसी के लिए कड़ी जद्दोजहद में लगा हुआ है। जिस तरह से बीजेपी इन दिनों कुर्मी जाति को रिझाने के लिए कोशिशें कर रही है। उससे इन दोनों परिवारों की साख दांव पर लगी है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि ये दोनों परिवार प्रदेश की राजनीति में कैसे वापसी कर पाते हैं? 

 बाराबंकी जिला आजादी के बाद से ही सोशलिस्ट का गढ़ रहा है। सत्ता किसी भी हो यहां का सियासी रुझान समाजवादियों के पक्ष मे ही रहा। ओबीसी बाहुल्य इस क्षेत्र में एक समय तक ओबीसी की यादव बिरादरी का दबदबा रहा, लेकिन 80 की दशक से 2017 तक यहां कुर्मी नेतृत्व का बोलबाला रहा। पहले बेनी प्रसाद वर्मा ने करीब 3 दशकों तक ओबीसी और मुस्लिम राजनीति का नेतृत्व किया और इसे समाजवादियों के गढ़ के तौर पर कायम रखा। इसी बीच जिले में एक और कुर्मी परिवार जिले की राजनीति में सक्रिय और प्रदेश की राजनीति में अपनी जगह बना ले गया। वो परिवार था पूर्व मंत्री स्व. संग्राम सिंह का परिवार। बेनी प्रसाद वर्मा जहां जिले के राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति का अहम हिस्सा बने। वहीं संग्राम सिंह के परिवार ने भी सियासत के मैदान में तमाम कीर्तिमान स्थापित किए। भले ही बेनी प्रसाद वर्मा का सियासी कद संग्राम सिंह के परिवार से बड़ा रहा हो, लेकिन 2017 तक संग्राम सिंह का परिवार भी जिले में ओबीसी राजनीति का केंद्र बना रहा। साथ ही प्रदेश सत्र की राजनीति में अपनी जगह बनाए रहा। 

समय गुजरता गया। बेनी प्रसाद वर्मा सपा से अलग हुए और फिर वापस हुए, लेकिन उनके सियासी रूतबे पर कोई असर नहीं हुआ, लेकिन 2017 में मोदी-योगी की लहर ने दोनों नेताओं की राजनीति को हाशिए पर ला दिया। हालांकि बेनी वर्मा के पुत्र राकेश वर्मा को सपा ने उस वक्त कैसरगंज से टिकट जरुर दिया, लेकिन बेनी वर्मा ने उन्हें वहां से लड़ाना बेहतर नहीं समझा। वहीं संग्राम सिंह वर्मा के भाई सुरेंद्र सिंह वर्मा ने 2017 का विधानसभा चुनाव बीएसपी के टिकट पर लड़ा, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इस चुनाव के बाद बेनी वर्मा शारिरिक तौर पर कमजोर हुए और 2020 में उनका देहांत हो गया। उधर संग्राम सिंह वर्मा परिवार ने सत्तारुढ़ बीजेपी का दामन थाम लिया। सत्ताधारी दल में होने की वजह से संग्राम परिवार का भले ही प्रदेश की राजनीति में रुतबा नहीं रहा हो, लेकिन जिले में उनका कद बना रहा। धीरे-धीरे समय गुजरा और 2022 का विधानसभा चुनाव आ गया। संग्राम परिवार को आस थी कि उन्हें बीजेपी उन्हें किसी न किसी तरह विधानसभा तक पहुंचाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इस बात से नाराज होकर संग्राम सिंह वर्मा का परिवार सपा में शामिल हो गया। संग्राम परिवार का सपा में शामिल होने नदियों के दो सिरों के आपस मिलने की तरह था। क्यूंकि भले ही दोनों परिवार सजातीय रहे हों, लेकिन राजनीतिक तौर दोनों परिवार एक दूसरे के धुर विरोधी थे, लेकिन राजनीति में विरोध या समर्थन स्थाई नहीं होता। दोनों परिवार सियासी तौर पर भी एक हो गए। 

 इन सब कवायद के बावजूद के 2022 के चुनाव में कुर्मी बिरादरी के इन दोनों नेताओं का असर इनकी ही जाति के मतदाताओं पर नहीं हुआ। नतीजा ये रहा कि राकेश वर्मा कुर्सी विधानसभा चुनाव बहुत ही मामूली अंतर से हार गए। वहीं संग्राम सिंह वर्मा का परिवार तो प्रदेश की राजनीति में आने की संभावना से ही दूर हो चुका था। क्यूंकि 2022 के विधानसभा चुनाव में दशकों बाद ये पहला मौका था जब संग्राम सिंह वर्मा का परिवार चुनावी मैदान से ही नदारद था। इस बीच संग्राम सिंह वर्मा परिवार की निकाय चुनाव के जरिए जिले की राजनीति में वापसी जरूर हुई। संग्राम सिंह वर्मा के छोटे भाई की पत्नी सपा के टिकट पर नवाबगंज नगरपालिका की चेयरमैन हो गईं। qqq अब 2027 का चुनावी समर का तकरीबन आगाज हो चुका है। मोदी-योगी की प्रचंड लहर, बीजेपी की कॉन्क्रीट रणनीति और बदले हुए माहौल में बेनी वर्मा और संग्राम सिंह वर्मा के परिवार के सामने चुनौतियां बढ़ा दी हैं। जानकारों की मानें तो राकेश वर्मा को सपा के आलाकमान नजरअंदाज नहीं कर सकते, बेनी वर्मा के नाम पर सहानभुति के लिए वो राकेश वर्मा को चुनाव मैदान में तो उतारेंगे, लेकिन कहां से ये अभी तक तय नहीं है। वो चुनाव में उतरेंगे और वर्तमान की परिस्थितियों से निपट कर प्रदेश की राजनीति में वापसी कर सकेंगे इस पर भी संशय है। क्यूंकि सपा की अंदरूनी कलह भी उनके सामने दीवार बनकर खड़ी हुई है। दूसरे ये कि सियासत में जिस आचार और व्यवहार की जरुरत होती है, वो भी उनमें कम ही बताई जाती है। 

खैर सपा में राकेश वर्मा के लिए उम्मीद की कहीं ना कहीं किरण तो है, भले ही वो धूमिल सी हो, लेकिन संग्राम सिंह वर्मा के लिए प्रदेश राजनीति में वापसी का दिया लगभग बुझ सा गया है। हालांकि बताया ये जा रहा है कि वो दरियाबाद विधानसभा क्षेत्र से ना सिर्फ इच्छुक हैं बल्कि इसके लिए वो प्रयासरत भी हैं। वो वहां के सियासी समीकरण और इतिहास भूगोल को भलिभांति समझते भी होंगे, लेकिन राकेश वर्मा के बीच एक ही जाति के एक जिले में दो टिकट होना लगभग असंभव प्रतीत हो रहा है, क्यूंकि इससे समाजवादी पार्टी के मौजूदा फार्मूले पीडीए में पी भारी पड़ जाएगा और असंतुलित हो जाएगा। इस असंतुलन का खामियाजा भी भुगतना पड़ सकता है। ऐसे में सुरेंद्र वर्मा का टिकट किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं होगा। 

खैर ये कयासआराइयां हैं। राजनीति में कुछ असंभव नहीं होता। मौजूदा सूरतेहाल ही देखी जाती है। बड़ा दुश्मन और विरोधी भी राजनीति में एक मंच पर आने की संभावनाओं का दरवाजा हमेशा खुला रखते हैं। तो टिकट क्या है। लेकिन देखना ये होगा कि जिले के ये दोनों परिवार प्रदेश की राजनीति में दोबारा वापसी कर पाते हैं और कैसे करते हैं।

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