मो. उमैर
Barabanki: जिले की सदर विधानसभा सीट गैर भाजपाई दलों के लिए हॉट सीट बनती जा रही है। जातीय समीकरण के लिहाज से ये सीट विपक्षी दलों के पक्ष में मजबूत होने की वजह से तमाम दलों के नेता सियासी तिकड़म लगाने में जुटे हुए हैं। सबसे हैरान करने वाली बात ये है कि इस सीट से तीन बार लगातार विधायक रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी में चुनाव लड़ने की ख्वाहिश रखने वालों की कमी नहीं है। सपा में आला कद रखने वाले कई नेता यहां से खुलकर दावेदारी पेश कर रहे हैं और सियासी जुगत के साथ तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे हैं। ऐसे में देखना होगा कि सपा मुखिया अखिलेश इस बार किस पर भरोसा करते हैं।
सदर विधानसभा क्षेत्र की बात की जाए तो जिले में इस वक्त और इस माहौल में सपा की सबसे मजबूत सीट यही है। एमवाई समीकरण सपा को यहां इतना मजबूत बना देती है कि इस सीट पर जीत के लिए दूसरे दलों को दिल्ली तक से रणनीति बनानी पड़ती है, लेकिन कामयाबी हाथ नहीं लगती। राम लहर हो यहा मोदी लहर या अब तक बीजेपी का खाता तक नहीं खुला है। पिछले तीन चुनावों से यहां लगातार धर्मराज सिंह यादव उर्फ सुरेश यादव चुनाव जीतते आ रहे हैं। हर चुनाव में उनकी जीत का अंतर भी बढ़ता रहा है। जब जिले के बड़े-बड़े दिग्गज जिले में कामयाब नहीं हो पा रहे थे, तब सुरेश अपनी जीत दर्ज कराकर हर बार लोगों को चौंका रहे थे। पार्टी आलाकमान का उनपर भरोसा लगातार बना हुआ है,लेकिन इस बार उन्हें अपने दल से ही बड़ी चुनौती मिल रही है। पार्टी के ही कई नेता यहां से टिकट चाह रहे हैं और लगातार सियासी हथकंडे अपनाकर टिकट हासिल करने की कोशिश में लगे हुए हैं। वहीं कई निजी चैनलो और मीडिया संस्थानों के सर्वे सपा के अंदर के माहौल को और गर्मा रहे हैं।
सपा की सिटिंग सीट होने के बावजूद यहां से इसी दल से टिकट चाहने वालों में सबसे पहला नाम पूर्व एमएलसी राजेश यादव उर्फ राजू यादव का है। वो पिछले एक साल से ना सिर्फ क्षेत्र में सक्रिय हैं बल्कि वो लगातार सुरेश यादव से मुकाबला कर रहे हैं। कई जगह वो ये भी कहते हैं कि पहले तो उन्हें ही टिकट मिला। ये बात सच भी है। 2012 में पहले उन्हीं को टिकट हुआ था। कभी-कभी सुरेश यादव के लिए उनकी वाणी इतनी तल्ख होती है कि लगता ही नहीं वो एक दल से हैं। राजेश यादव अखिलेश के करीबी हैं और उन्हें अखिलेश के हनुमान की संज्ञा दी जाती है। इधर सुरेश यादव के तकरीबन 15 साल के कार्यकाल में काफी एंटी इनकमबेंसी भी है। ऐसे में उनकी दावेदारी का कुछ तो मतलब निकलता ही है।
दावेदारी सिर्फ राजेश यादव ही नहीं कर रहे। सोशल मीडिया के प्लेटफॉरम्स के पेज स्क्रोल करे और सड़क पर चलते वक्त खंभों पर नजर दौड़ाएं तो सपा के कई दावेदार लटके हुए मिल जाएंगे। इनमें एक नाम राम सेवक यादव के एक परिवार के एक सदस्य का भी है। इसके अलावा कुछ और लोग भी हैं। जो सदर सीट से टिकट के लिए जुगाड़ बट्टे में लगे हुए हैं। इनके लिए मीडिया संस्थानों के द्वारा किए गए सर्वे के नतीजे बड़े हथियार साबित हो रहे हैं,जिनमें सुरेश यादव की लोकप्रियता को घटते हुए दिखाया गया है। इसके अलावा वो सुरेश यादव के व्यवहार और उनके व्यक्तिगत अंदाज पर भी सवाल उठाकर उनका टिकट कटवाने की कोशिश कर रहे हैं। अब देखना ये है कि वो कितना कामयाब होते हैं।
सुरेश यादव का विरोध करके टिकट लेने के प्रयास चाहे जो जितने कर ले, लेकिन उनके टिकट कटने की उम्मीद लगभग ना के बराबर ही है। विरोधियों के तर्क हो दावे जो भी हों, वो इतने मजबूत या भरोसेमंद नहीं हैं कि तीन बार से लगातार विपरीत हालात में चुनाव जीतने वाले शख्स को आलाकमान नजकअंदाज करे। ऐसे शख्स का टिकट काटना किसी भी पार्टी के आलाकमान के लिए आसान नहीं होगा और सपा जैसी पार्टी में तो ये बिल्कुल संभव ही नहीं हो सकता।
खैर चुनाव लड़ने के लिए दावेदारी हर पार्टी के कार्यकर्ता की हो सकती है। ये उनका अधिकार भी और पार्टी का अंदरूनी मामला भी, लेकिन इन दिनों सपा के अंदर से जिस तरह से दावेदार सामने आए हैं। उससे सियासी माहौल तो गर्मा ही रहा है। अब देखना ये है कि किस दावेदार पर अखिलेश की नजर-ए-इनायत होती है, लेकिन इतना तय है कि चुनाव तक आपको टिकट के दावोदारों को कई हथकंडे आपको देखने को मिल जाएंगे।

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