-पाटेश्वरी प्रसाद
आपातकाल। स्वतंत्र भारतीय इतिहास का संक्रमण काल। एक निरंकुश सत्तालोलुप शासक द्वारा लोकतंत्र पर कुठाराघात और अधिनायकवादी व्यवस्था थोपने का काल। लाखों निरपराध नागरिकों के बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया या उपचार के अनिश्चितकाल तक कारागार में बन्द होने का काल। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के सम्पूर्ण दमन का काल। 25 जून को आपातकाल थोपे जाने के दिन की सालगिरह है। इस महत्वपूर्ण अवसर पर आपातकाल के समय लगभग बीस महीने तक जिला कारागार बाराबंकी में बंद रहे 31 वर्षीय युवक और तत्कालीन सोशलिस्ट पार्टी के जिलाध्यक्ष राजनाथ शर्मा की कहानी, जो उस काले समय का एक प्रमाणिक दस्तावेज।
26 जून 1975 की सुबह। रेडियो पर सूचना मिलती है कि तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के कहने पर भारतीय संविधान की अनुच्छेद 352 के अधीन आपातकाल की घोषणा की थी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे विवादास्पद और अलोकतांत्रिक काल था। आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किए जाने वाले कांग्रेस विरोधी, विपक्षी नेताओं और पत्रकारों की सूची बनाने का काम इंदिरा गांधी के बेटे व विवादास्पद कांग्रेस नेता संजय गांधी स्वयं किया करते थे। वो भी तब जब संजय गांधी किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे।
मैं उन दिनों सोशलिस्ट पार्टी का जिलाध्यक्ष था और पूर्व विधायक सुंदर लाल दीक्षित महामंत्री थे। मैं धनोखर स्थित शहर के कमान में रहता था। भीषण गर्मी का मौसम था। सुबह रेडियो पर खबर आई कि पिछली रात अराजकता की स्थिति से निपटने के लिए और विदेशी शक्तियों के षड़यंत्र से देश को बचाने के लिए सारे देश में आपातकाल लागू हो गया है। आपातकाल क्या होता है- यह किसी को पता नहीं था। लोग तरह-तरह के अनुमान लगा रहे थे। अभी बड़े पैमाने पर हुई और हो रही गिरफ्तारियों का खुलासा नहीं हुआ था।
मैंने फौरन अपना घर छोड़ पूर्व विधायक बाबूलाल कुशमेश के घर चला गया। जहां मुझे पता चला कि पुलिस मेरे घर गई थी वह मेरी खोज में कई जगह छापेमारी कर रही है और लोगों को परेशान कर रही है। जिसके बाद मैंने बाराबंकी छोड़ दिया और लखनऊ जा पहुंचा। जहां दोहरा शरीर, गौर वर्ण, रोबीला चेहरा, अद्घी का धवल श्वेत कुर्ता और धोती पहने हर्षवर्धन से मुलाकात हुई। हर्षवर्धन मेरे विश्वविद्यालय की छात्र जीवन के साथी थे। बह बाद में महाराजगंज से विधायक और सांसद हुए। जिनके साथ मेती महल में कई दिनों तक रहा और भूमिगत आन्दोलन में सक्रिय रहा।
ध्यान रहे कि 12 जून 1975 को ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जज जगमोहनलाल सिन्हा ने इंदिरा गांधी की संसद की सदस्यता समाप्त कर दी थी और देश भर से इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र की माँगें उठ रही थीं। जिसके बाद इन्दिरा गांधी ने देश में आपालकाल की घोषणा की। पूरे देश में गिरफ्तारियाँ शुरु हो गई। अखबार और रेडियो पर सेंसरशिप लगा दी गई। अभिव्यक्ति की आजादी पर पाबंदी लगा दी गई। ऐेसी स्थिति इसके पहले देश में कभी आई नहीं थी। विरोध के लोकतांत्रिक अधिकार पर कभी प्रश्नचिन्ह नहीं लगा था। यह हमारे लिए और मुझे लगता है एक दो दिनों तक प्रशासन के लिए भी, नई स्थिति थी।
बहरहाल मैंने सोचा कि हम नौजवानों को इकट्ठा करके नारे लगाते हुए गिरफ्तारियाँ देंगे। इसी योजना के तहत बाराबंकी से जब हम भुहैरा गांव जा रहे थे तभी रास्ते में ओबरी स्थित पेटोल पम्प पर पुलिस घेराबंदी में 26 जुलाई 1975 को मुझे गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तारी के बाद पुलिस कोतवाली ले गई जहां से देर रात मुझे जिला कारागार भेजा गया। जेल में आपातकाल के बंदी राजनैतिक कार्यकर्ताओं की बहुत खराब हालत थी। उन्हें सामान्य कैदियों से अलग फांसी की बैरिक में रखा जाता था। जेल जाने के बाद मेरे परिवार की स्थिति बहुत खराब हो गई। मेरी पत्नी जोकि क्षय रोग से पीड़ित थी उनका एक फेफड़ा खराब हो चुका था। माता-पिता और बच्चों की देखरेख करने वाला कोई नहीं था। घर में खाने की बेहद कमी हो गई थी। कभी खाना बनता तो कभी भूखे रहना पड़ता था। परिवारीजनों को कैदियों से मिलने नहीं दिया जाता था।
करीब तीन माह बाद पत्नी के इलाज के लिए जिला जज ने 15 दिनों की पैरोल दी। फिर जेल चलें गए। कुछ समय बाद जब पैरोल मिली तो हर्षवर्द्धन सिंह के साथ दिल्ली चले गए जहां डायनामाइट कांड के मुख्य अभियुक्त जॉर्ज फर्नांडिस तीस हजारी कोर्ट लाए गए थे। वहां उनसे मुलाकात हुई। फिर शाम को अटल बिहारी बाजपेई और लाल कृष्ण आडवाणी से मुलाकात करके बाराबंकी चले आए। फिर 21 मार्च 1977 को जब आपाकाल खत्म हुआ। तब हम लोग जेल से छूटे। श्री शर्मा ने बताया कि आपातकाल की घोषणा से पहले जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सरकारों में व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ सम्पूर्ण क्रान्ति का विगुल फूंका। यह आन्दोलन चार चरणों में पहुंचा ही था कि आपातकाल की घोषणा हो गई।
पहले से तीसरे चरण के आन्दोलन में लगातार सक्रिय रहा और जेल गया। दूसरे चरण के आन्दोलन में नैनी कारागार में अटल बिहारी बाजपेयी और राजनाराण के साथ बंदी रहा। आपातकाल के खत्म होते ही मैं जनता पार्टी की राज्य कार्यकारिणी का सदस्य और सचिव बनाया गया। लेकिन राजनैतिक दलों में बढ़ी सत्ता की भूख और जातीय आधारित राजनीति से क्षुब्ध होकर गांधी और लोहिया के विचारों पर काम करने का निर्णय लिया और गांधी जयन्ती समारोह ट्रस्ट का गठन कर नई पीढ़ी में समाजवाद की अलख जगाने में लग गया।

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