एक ड्रायवर ने बताया कि मुझे कुछ ऐसे मकानों को भी तोड़ना पड़ रहा था जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दे दिया था कि उन्हें न तोड़ा जाए, परंतु मेरी आँखों के सामने कानून की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं।
एक और ड्रायवर ने बताया कि मुझे कुछ ऐसे मकान भी तोड़ना पड़े जिनके भीतर परिवार अभी भी रह रहा है। मुझे महसूस होता था कि मैं उनकी सारी जीवन की कमाई छीन रहा हूँ। ध्वस्त हुए मकान के चारों और असहाय लोगों की चीत्कार सुनाई पड़ रही थी। ये चीत्कारें कई दिनों तक मुझे झकझोरती रहीं और मेरे कानों में सुनाई देती रहीं। एक मकान मैं ध्वस्त भी नहीं कर पाया था कि मुझे एक और मकान इसके बाद तोड़ना था। मुझे यह बताया जाता था कि मकान इसलिए तोड़े जा रहे हैं ताकि शहर इनके तोड़ने के बाद सुंदर दिखेगा, सड़क चौड़ी हो जाएंगी और वीआईपी के आवागमन में भारी सुविधा हो जाएगी।
ड्रायवरों ने बताया कि ये मकान इसलिए तोड़े जा रहे हैं क्योंकि यहां एक बगीचा बनेगा, जिस बगीचे में लखपति, करोड़पतियों के बच्चे खेल सकेंगे। इनके तोड़ने के बाद कुछ लोगों को यह कहते हुए सुना कि अब हमारे चारों तरफ हरियाली होगी।
मामला उस समय और गंभीर हो जाता है जब जिनके मकान तोड़े जाते हैं वे गरीब होते हैं, बरसों की कमाई में से एक रोटी कम खाकर इन लोगों ने यह मकान बनाए हैं। अपना मकान तोड़े जाने के बाद इन्हें सड़कों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ेगा
मुंबई कार्पोरेशन के मेहर बख्श शेख कहते हैं कि खुदा ही जानता है कि जब हम यह दुष्कर्म करते हैं तो हमारे दिल पर क्या गुज़रती है। शेख स्वयं एक गंदी बस्ती में रहते हैं। उन्हें ऐसे लोगों के मकान भी तोड़ना पड़े जो उनके आसपास थे। रोती हुई महिलाएँ अपना दर्द, इस तरह बता रही थीं जैसे उनके ऊपर आसमान गिर गया हो।
हमें यह बताया जाता है कि जिन मकानों को हम तोड़ रहे हैं वो अपराधियों के हैं और गैर-कानूनी हैं। परंतु मैं सोचता था कि मैं ऐसे माफियाओं को जानता हूँ जिन्होंने कई मंजिला मकान बनाए हैं और ठाठ से रहे हैं। किसकी हिम्मत है कि उनके मकान गिराए? मैं जानता हूँ कि हम लोग जमीन पर मकान बनाते हैं, झुग्गियां बनाते हैं और यदि हम ऐसी जमीन पर मकान न बनाएं तो कहां बनाएं? हमारा देश गरीबी में डूबा हुआ है। हमारे परिवार फुटपाथ पर रह रहे हैं। पुलों द्वारा दी गई छाओं में रह रहे हैं। क्या ऐसे लोगों को अपना मकान बनाने का अधिकार नहीं है?
नागपुर कार्पोरेशन के एक ड्रायवर ने बताया कि मुझे सिर्फ 15 मिनट पहले बताया जाता है कि कौन-सा मकान तोड़ना है। मुझे तुरंत जाना पड़ता है। मुझे आदेश दिया गया कि मैं 15 मिनट में संजय बाग कॉलोनी पहुंचूं। जब मैं वहां पहुंचा तो बड़ी संख्या में वहां पुलिस वाले, कैमरे वाले पहले से पहुंच गए थे और उस दृश्य को अपने कैमरे में शामिल करने के लिए तैयार थे जो मुझे अपने बुलडोजर से बनाने हैं।
मुझे एक व्यक्ति का मकान तोड़ना था जिसका दंगे में शामिल होने का आरोप था। ठीक 10:40 पर मकान तोड़ने का काम चालू हो गया। पहले खिड़कियां तोड़ी गईं, फिर दीवारें तोड़ी गईं। वैसे इस बात के कोई पुख्ता सबूत नहीं थे कि फहीम खान जिनका मकान तोड़ा जा रहा है वो देंगे में शामिल थे, परंतु अधिकारियों का कहना था कि उन्हें मालूम है। थोड़ी देर में वह मकान तोड़ दिया गया।
उत्तरप्रदेश के देवेन्दर सिंह बताते हैं कि स्टीयरिंग व्हील पर मेरे हाथ कांपते हैं। पहले भी कांपते है और बाद में भी कांपते हैं। ये उस समय भी कांपते हैं जब मैं किसी अपराधी का मकान भी तोड़ता हूँ। यह हो सकता है कि परिवार में रहने वाला एक सदस्य अपराधी हो परंतु क्या उस परिवार में रहने वाले बच्चे, महिलाएँ, वृद्धजन अपराधी हैं? उन्हें तो पता ही नहीं होता कि उनके परिवार का एक सदस्य अपराधी है।
मुझे मार्च माह का वह दिन याद है जब मुझे एक मकान तुरंत तोड़ना था। मेरे बुलडोजर के पीछे खड़े अधिकारी कह रहे थे कि जल्दी करो, जल्दी करो। एक तरफ उनका आदेश था और दूसरी तरफ मैं चिल्लाती हुई औरतों से घिरा था। वो जानना चाह रहीं थीं कि उनका मकान क्यों तोड़ा जा रहा है। मुझे रोना आ रहा था पर क्या करता आदेश था। कभी-कभी मुझे लगता था कि बुलडोजर छोड़ मैं इन महिलाओं की चीत्कार में शामिल हो जांऊ।
जो लोग प्रभावित होते थे वो बुलडोजर घेरे लेते थे, बुलडोजर पर चढ़ जाते थे और उस पर चारों तरफ से हमला करते थे। मैं बुलडोजर में लगे कांच की खिड़कियों को बंद कर देता था ताकि मुझे लोगों की गालियां ना सुनना पड़े। इस तरह का विरोध कई अवसरों पर हिंसा का रूप लेता था। मैं स्वयं टूटे हुए कांचों से घायल हुआ हूं। लोग लगातार पत्थर फेंक रहे थे। सभी बुलडोजरों के ड्रायवरों की समान शिकायत थी जो खतरों से भरा काम करते हैं। ड्रायवरों का कहना था कि उसके बाद भी हमारी तनख्वाह ना के बराबर है।
एक ड्रायवर ने बताया कि मेरी तनख्वाह सिर्फ 18 हजार मासिक है। मेरे पिता की मृत्यु के बाद सारे परिवार का पालन-पोषण की जिम्मेदारी मेरी है।
इसी तरह लगभग सभी ड्रायवर शिकायत कर रहे थे कि वे अपनी जान पर खेलकर यह काम करते हैं। एक-दो को छोड़ दें तो सभी बुलडोजर चलाने वाले नगरपालिकाओं के कर्मचारी हैं, वे भी ठेके पर। इस तरह के कर्मचारियों को 500 रू. दिन के हिसाब से 10 घंटे काम करने पर मिलते हैं। यदि तोड़ने वाला मकान बहुत बड़ा है तो कुछ ज्यादा मिल जाता है।
एक ड्रायवर ने बताया कि वह ठेके पर काम करता है और एक मकान तोड़ने पर 2000 रू. प्रति घंटे के हिसाब से मेहनताना मिलता है। परंतु इस गंदे काम करने के लिए मिला पैसा मैं कभी-कभी गरीब लोगों को दान दे देता हूँ।
कुछ ड्रायवर ऐसे भी मिले जिन्होंने इस अमानवीय काम को करने से इंकार कर दिया। उनमें से एक सुमित पटेल ने बताया कि मैंने एक मशीन खरीद ली है और मैं लगातार पुलिस को घर तोड़ने के काम से इंकार करता रहा। ईश्वर की कृपा से इस समय मेरे पास बहुत काम है और मुझे अब घर तोड़ने का काम करने की जरूरत नहीं है, जिससे मेरी आत्मा दुखी हो।
मेरी मशीन ने अभी तक ना तो कोई दुकान तोड़ी है, ना तो कोई मकान तोड़ा है। मैंने घरों की छत तोड़ने का काम नहीं किया है।
मुकेश पाटिल बताते हैं कि मेरे बुलडोजर से 25 मकान ध्वसत किए गए हैं। इसमें संतोष अम्बेकर का मकान भी शामिल है जिसकी कीमत 10 करोड़ आंकी गई है। संतोष अम्बेकर एक जाना-माना अपराधी है। (टाईम्स ऑफ इण्डिया से साभार)
-एल.एस. हरदेनिया
संयोजक-राष्ट्रीय सेक्युलर मंच द्वारा प्रसाप्रसारित
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