Barabanki News... जिला अलपसंख्यक कल्याण अधिकारी के पद पर तैनात बालेंदु द्विवेदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। वो एक उम्दा अधिकारी के साथ हिंदी साहित्य के प्रखर और बहुआयामी रचनाकार हैं। उनका साहित्यिक सफर मदारीपुर जंक्शन (उपन्यास, 2017) से शुरू हुआ, जिसने उन्हें हिंदी साहित्य में प्रतिष्ठित पहचान दिलाई। यह उपन्यास पाठकों और समीक्षकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय हुआ और इसे अमृतलाल नगर सर्जना सम्मान सहित कई पुरस्कार प्राप्त हुए। इस उपन्यास की नाटकीयता ने इसे देशभर में एक दर्जन से अधिक मंचीय प्रस्तुतियों और विश्वविद्यालयों में शोध का विषय बना दिया। उनकी अन्य प्रमुख कृतियों में मृत्युभोज (नाटक, 2019), वाया फुरसतगंज (उपन्यास, 2021) और परंपरा में जीवन की खोज (आलोचना) शामिल हैं। उन्होंने 'प्रिय कथाकार की अमर कहानियां: प्रेमचंद' और 'एक था मंटो' जैसे महत्वपूर्ण संग्रहों का संपादन भी किया है। बालेंदु का लेखन भारतीय समाज, राजनीति और मानवीय जटिलताओं को गहराई से अभिव्यक्त करता है। उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी आंचलिकता और यथार्थवाद है, जो सही मायनों में समकालीन समाज का दर्पण हैं। विचारशील संवेदनाओं और सजीव भाषा-शैली के साथ उनका साहित्य हिंदी को नई ऊंचाइयों तक ले जाने में सक्षम है। वाणी प्रकाशन से उनका तीसरा उपन्यास बादशाह सलामत हाज़िर हों' विश्व पुस्तक मेले में प्रकाशित हुआ है। जिसका विमोचन पद्मश्री अशोक चक्रधर के हाथों हुआ। बालेंदु द्विवेदी के साहित्यिक सफर पर बाराबंकी मिरर ने उनसे खास बातचीत की। पेश है इस बातचीत के कुछ अंश.... बाराबंकी मिरर: हिंदी साहित्य में आपकी पहचान एक ऐसे कथाकार के रूप में बनी है, जो समाज, राजनीति और सत्ता की जटिलताओं को अपने लेखन में बड़े प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं। मदारीपुर जंक्शन, वाया फुरसतगंज और अब बादशाह सलामत हाज़िर हों—तीनों उपन्यासों को लेकर हिंदी पाठकों और समीक्षकों में काफी चर्चा रही है। क्या आप इन तीनों उपन्यासों को एक साथ रखकर अपनी लेखकीय यात्रा पर प्रकाश डालेंगे?
बालेंदु द्विवेदी: मेरी लेखनी मेरे अनुभवों और समाज की विभिन्न परतों को समझने की कोशिश का परिणाम है। जब मैंने मदारीपुर जंक्शन लिखा, तो मेरा ध्यान गाँव, कस्बे और छोटे शहरों की सामाजिक और राजनीतिक संरचनाओं पर था। यह उपन्यास सत्ता, नौकरशाही और जनता के बीच के अंतर्विरोधों को उजागर करता है। वाया फुरसतगंज तक आते-आते कथा का फलक बदल गया और वह मुख्यधारा की राजनीति की पड़ताल करने लगा—यह वह राजनीति है, जो जनता को एक साधन की तरह इस्तेमाल करती है और सत्ता-प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार होती है। बादशाह सलामत हाज़िर हों इस यात्रा में एक और महत्वपूर्ण मोड़ है, जिसमें इतिहास के भीतर जाकर सत्ता की निरंकुशता, पागलपन और आत्ममुग्धता का अध्ययन किया गया है। ये तीनों उपन्यास भले ही अलग-अलग संदर्भों में रचे गए हैं, लेकिन इनमें सत्ता, व्यवस्था और व्यक्ति के आपसी संघर्ष की अनुगूंज स्पष्ट सुनाई देती है।
बाराबंकी मिरर: मदारीपुर जंक्शन को पाठकों ने एक महत्त्वपूर्ण आंचलिक उपन्यास माना। क्या आपको लगता है कि आज के समय में आंचलिकता साहित्य में अपनी भूमिका निभा पा रही है?
बालेंदु द्विवेदी: आंचलिकता केवल स्थान-विशेष का चित्रण नहीं, बल्कि समाज की जड़ों को पकड़ने का एक तरीका है। हिंदी में फणीश्वरनाथ रेणु, श्रीलाल शुक्ल, अमृतलाल नागर और शिवमूर्ति ने इसे अपने लेखन में बखूबी साधा है। मदारीपुर जंक्शन भी इसी प्रवृत्ति का विस्तार है। यह उपन्यास सत्ता और समाज के उन नाटकीय अंतर्विरोधों को पकड़ने की कोशिश करता है, जो गाँव और कस्बों में रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। आज भी आंचलिक लेखन प्रासंगिक है, लेकिन अब यह नए रूप में उभर रहा है—अब यह केवल भाषा, बोली और भूगोल तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक संदर्भों को पकड़ने में सक्षम हो रहा है।
बाराबंकी मिरर: वाया फुरसतगंज मुख्यधारा की राजनीति की पड़ताल करता है। आपको क्या लगता है कि आज राजनीति केवल सत्ता के लिए एक साधन भर बन गई है, या उसमें विचारधारा का स्थान बचा है?
बालेंदु द्विवेदी: राजनीति का असली उद्देश्य समाज का उत्थान और कल्याण होना चाहिए, लेकिन आज के समय में यह केवल सत्ता-प्राप्ति का खेल बनकर रह गई है। वाया फुरसतगंज इसी यथार्थ को उजागर करता है। इसमें विचारधारा और नैतिकता से शून्य होती राजनीति का वह रूप दिखाया गया है, जहाँ नेता सिर्फ़ जनता की भावनाओं को भुनाने के लिए विचारधारा का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उनके भीतर कोई ठोस वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं होती। यह उपन्यास उस राजनीति की परतें खोलता है, जिसमें वादे और आदर्श महज़ नारे बनकर रह जाते हैं, और असली खेल सत्ता की कुर्सी हासिल करने का होता है।
बाराबंकी मिरर: बादशाह सलामत हाज़िर हों तानाशाही और सत्ता के उन्माद को दर्शाता है। क्या आपको लगता है कि यह उपन्यास केवल अतीत की कथा है, या आज भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है?
बालेंदु द्विवेदी: सत्ता का चरित्र समय के साथ बदलता नहीं, केवल उसके चेहरे बदलते हैं। बादशाह सलामत हाज़िर हों न केवल इतिहास के पन्नों में बसे एक सनकी नवाब की कहानी कहता है, बल्कि यह हर उस दौर के लिए एक चेतावनी है, जब कोई शासक सत्ता को अपनी निजी जागीर समझने लगता है। नकबुल्ला नवाब का चरित्र केवल अतीत में नहीं, बल्कि आज के समय में भी हमें अलग-अलग रूपों में दिखता है—ऐसे नेता, जो अपने अहंकार और सनक में जनता को मात्र एक मोहरा समझते हैं, और सत्ता को स्वयं के अस्तित्व से जोड़कर देखते हैं।
बाराबंकी मिरर: उपन्यास का क्लाइमैक्स बेहद नाटकीय है। क्या इसे मंच पर प्रस्तुत करने की संभावना है?
बालेंदु द्विवेदी: निःसंदेह। बादशाह सलामत हाज़िर हों अपने कथ्य और संरचना में अत्यंत नाटकीय है। इसके संवाद, सत्ता-संघर्ष, चरित्रों के टकराव और नवाब के पतन का दृश्य—ये सभी रंगमंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किए जा सकते हैं। यह उपन्यास सत्ता के नशे और उसके विनाश की कहानी कहता है, और इसे मंचित करने पर यह एक बेहद सशक्त नाटक के रूप में उभरेगा।
बाराबंकी मिरर: यदि इन तीनों उपन्यासों को एक साथ रखकर देखा जाए, तो क्या कोई साझा सूत्र निकलता है?
बालेंदु द्विवेदी: हाँ, तीनों उपन्यास सत्ता के अलग-अलग रूपों और उनके प्रभावों को उजागर करते हैं। मदारीपुर जंक्शन में सत्ता ग्रामीण प्रशासन और नौकरशाही के गठजोड़ के रूप में दिखती है, वाया फुरसतगंज में यह मुख्यधारा की राजनीति के छल-प्रपंच में बदल जाती है, और बादशाह सलामत हाज़िर हों में यह सत्ता के उन्माद और निरंकुशता का चरम रूप ले लेती है। इन तीनों उपन्यासों में एक चीज़ समान है—व्यक्ति और सत्ता के बीच का संघर्ष। सत्ता किस तरह व्यक्ति को बदलती है, किस तरह समाज को अपने नियंत्रण में रखती है, और कैसे यह अपने ही अंत की ओर बढ़ती है—यही इन तीनों रचनाओं की केंद्रीय थीम है।
बाराबंकी मिरर: अंत में, पाठकों से क्या कहना चाहेंगे?
बालेंदु द्विवेदी: पाठकों के बिना साहित्य अधूरा है। मैं चाहता हूँ कि मेरा साहित्य केवल पढ़ा ही न जाए, बल्कि उस पर चर्चा हो, संवाद हो, और यह समाज को नए नज़रिए से देखने के लिए प्रेरित करे। मेरा लेखन किसी न किसी रूप में सत्ता, समाज और व्यक्ति के जटिल संबंधों की पड़ताल करता है, और यदि यह पाठकों को सोचने पर मजबूर कर सके, तो मैं इसे अपनी सफलता मानूँगा।
Barabanki News
DMO
Balendu Dwivedi
creating
special identity
Hindi literature
expresses
society
politics
human
complications




0 टिप्पणियाँ