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Barabanki : यूनानी डे पर 85 साल के बुजुर्ग को फिटनेस के लिए किया सम्मानित

 

Barabanki News... जिले में हकीम अजमल खां की यौमे पैदाइश पर यूनानी डे धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर डॉक्टर (हकीम) ए एच उसमानी के निवास पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में हकीम अजमल खान साहब को खिराज-ए-अकीदत पेश की गई और समाज के लिए ताउन पर रोशनी डाली गई। हर साल की तरह इस साल भी मोहल्ले के सबसे बुज़ुर्ग जनाब हबीब साहब को यूनानी स्कॉलर्स एसोसिएशन की तरफ से माला और शाल पहनाकर सम्मानित किया गया, हबीब साहब की उम्र 85 साल है। वो रोज 6 किलोमीटर पैदल चलते हैं और वो जिस्मानी और जहनी तौर पर बिलकुल फिट हैं।

   

कार्यक्रम में डॉक्टर  (हकीम) एएच  उसमानी ने हकीम अजमल खान साहब की जिंदगी पर तफ़सील से चर्चा की,डॉक्टर एमएस सिद्दीकी, डॉक्टर सलमान यूनुस, बाबू लाल जी,चौधरी शुएब साहब ने हकीम अजमल खान साहब के बारे मे अपने ख्याल का इजहार किया। इस बार हकीम अजमल खान साहब  की जिंदगी  के बारे मे सवाल  भी पूछे गए, सही जवाब देने वालों  को पुरस्कार भी दिए गए। प्रोग्राम में डॉक्टर  सैफ,डॉक्टर अकमल, डॉक्टर अबू बक्र, डॉक्टर जियाउरहमान,डॉक्टर आलम,डॉक्टर नूर आलम, डॉक्टर तनवीर सुल्ताना, मोहममदुलला साहब,साद किदवई, अदीब शौकत, आमिर उस्मानी, चन्दन, अफफान, नियाज, बहुत सी दवा कंपनी के एम र और बाराबंकी के बहुत से सम्मानित  लोगों  ने शिरकत की।
कौन थे हकीम अजमल 
हकीम अजमल खान भारतीय चिकित्सा क्षेत्र के एक महान नाम हैं, जिनका योगदान न केवल चिकित्सा बल्कि भारतीय समाज के लिए भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। वे न केवल एक प्रसिद्ध हकीम थे, बल्कि एक महान समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनका जीवन संघर्ष और समर्पण की प्रेरणा देता है।
प्रारंभिक जीवन
 हकीम अजमल खान का जन्म 11 फरवरी, 1868 को दिल्ली में हुआ था। वे एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार से थे और उनके परिवार का भारतीय चिकित्सा प्रणाली में गहरा प्रभाव था। हकीम अजमल खान के दादा, हकीम रजा अली खान, भी मशहूर हकीम थे। उनका परिवार पारंपरिक तिब्बी चिकित्सा पद्धतियों में माहिर था। हकीम अजमल खान ने भी पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में ही शिक्षा प्राप्त की और अपनी चिकित्सा क्षमता का प्रचार-प्रसार किया।
चिकित्सा के क्षेत्र में योगदान 
हकीम अजमल खान ने अपनी चिकित्सा यात्रा की शुरुआत तिब्बी (आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा) पद्धतियों से की। वे उन चिकित्सकों में से थे जिन्होंने भारतीय पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को दुनिया के सामने प्रस्तुत किया। हकीम अजमल खान ने दिल्ली में "एज़मल खाँ यूनानी मेडिकल कॉलेज" की स्थापना की, जो आज भी भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में एक प्रमुख संस्थान है।
उनका मानना था कि भारतीय चिकित्सा पद्धतियों को एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विकसित किया जाए। इसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा इस कार्य में समर्पित किया। हकीम अजमल खान के योगदान से यूनानी चिकित्सा पद्धतियों को एक नई दिशा मिली, और उनकी शिक्षाएं आज भी चिकित्सा क्षेत्र में प्रासंगिक हैं। 

 स्वतंत्रता संग्राम में योगदान 
हकीम अजमल खान का योगदान केवल चिकित्सा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं था, बल्कि वे एक महान स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उनका मानना था कि भारत का स्वतंत्र होना बहुत जरूरी था ताकि भारतीय लोग अपनी स्वतंत्रता से अपनी चिकित्सा और सामाजिक व्यवस्था को बेहतर बना सकें।

 वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े थे और महात्मा गांधी के साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लिया। हकीम अजमल खान ने न केवल भारतीय स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया, बल्कि वे भारतीय मुसलमानों के अधिकारों की रक्षा के लिए भी आवाज उठाते थे। 

 सामाजिक कार्य 
हकीम अजमल खान का जीवन केवल चिकित्सा या राजनीति तक सीमित नहीं था, वे एक महान समाज सुधारक भी थे। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास, कुप्रथाओं और भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाई। वे शिक्षा के प्रसार के लिए भी समर्पित थे और उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना की, जिनमें मुस्लिम बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने का प्रयास किया गया। 

 हकीम अजमल खान का जीवन अत्यधिक प्रेरणादायक है। वे न केवल चिकित्सा के क्षेत्र में एक महान वैज्ञानिक थे, बल्कि एक स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और भारतीय संस्कृति के प्रबल समर्थक भी थे। उनका योगदान भारतीय चिकित्सा पद्धतियों और समाज के लिए सदैव याद किया जाएगा। उनका जीवन यह सिखाता है कि अगर हम अपने काम के प्रति ईमानदार और समर्पित रहें, तो हम किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकते हैं। 

 उनकी मृत्यु 4 जुलाई 1927 को हुई, लेकिन उनका योगदान आज भी भारतीय चिकित्सा और समाज में जीवित है। हकीम अजमल खान की धरोहर और उनके कार्यों को कभी नहीं भुलाया जा सकता।

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