Barabanki News... कैप्टन अब्बास अली स्वतंत्रता संग्राम के नायक और आज़ाद हिंद फौज के सिपाही थे। जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी बहादुरी की मिसाल कायम की। उनकी आत्मकथा ‘न रहूं किसी का दस्तनिगर’ उनके अदम्य साहस और समाजवादी विचारधारा को दर्शाती है। वह समाजवाद की जीती जागती मिसाल थे। उन्होंने समाजवादी विचारधारा को भी मजबूत करने के लिये महत्वपूर्ण योगदान दिया था। उक्त विचार शुक्रवार को गांधी भवन में समाजवादी आन्दोलन के सतत सेनानी, जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधान परिषद सदस्य रहे कैप्टन अब्बास अली के 105वीं जयन्ती पर आयोजित सभा की अध्यक्षता कर रहे समाजवादी चिन्तक एवं गांधी जयन्ती समारोह ट्रस्ट के अध्यक्ष राजनाथ शर्मा ने व्यक्त किए।
शर्मा ने कैप्टन अब्बास अली के साथ अपने संस्मरण को साझा करते हुए कहा कि आजादी की लड़ाई लड़ते हुए उन्हें मुलतान के किले में कैद कर फांसी की सजा सुनाई गई थी। बाद में आजादी को लेकर नेहरु और माउंटबेटन में समझौते के बाद उनकी मुलतान की जेल से रिहाई संभव हो सकी थी। कैप्टन अब्बास अली बुलंदशहर से एमएलसी भी रहे। वे राममनोहर लोहिया के बेहद करीबी थे और उनके समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने में खास योगदान दिया। वे जीवन के 94वें बसंत तक सामाजिक तौर पर सक्रिय रहे और समाज के भले के लिए अपना योगदान देते रहे।
शर्मा ने कहा कि कैप्टन अब्बास अली के बेटे कुर्बान अली देश के प्रतिष्ठित एवं वरिष्ठ पत्रकार है। इन दिनों वह समाजवादी आंदोलन का इतिहास (1934-1977) और इस आंदोलन के दस्तावेज़ों को संपादित करने का काम कर रहे है। उनकी अब्बास अली की वैचारिक नीतियों और समाजवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका रही है। वैचारिक मूल्यों की लड़ाई लड़ने वाले योद्धा अब्बास अली को याद करना और उनके बताए रारस्ते पर चलना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इस मौके पर सुहैल अहमद किदवई, वासिक वारसी, मृत्युंजय शर्मा, विनय कुमार सिंह, राकेश शर्मा, ज्ञान सिंह यादव, हुमायूं नईम खान, पाटेश्वरी प्रसाद, उमेश श्रीवास्तव, शिवा शर्मा, अशोक जायसवाल, राजू सिंह, साकेत मौर्य, रंजय शर्मा, मनीष सिंह, मोहम्मद वसीक आदि कई लोग मौजूद रहे।
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