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Article: 31 दिसंबर , आंखों देखा हाल

 

डॉ शमशुल आरफीन ( शाहिद ) 

 रात के तक़रीबन 8 बज रहे थे जब मैंने क्लीनिक बंद की और घर पहुंच कर चाय पीकर खुद को तरो ताज़ा किया। 

 मामूल के मुताबिक घर से बाहर निकला और पास की दुकान की तरफ बढ़ गया, जहां अलाव तेज़ जल रहा था और आसपास कई कुर्सियां रखी थीं, जिस पर कुछ लोग बैठे थे। ये वो लोग थे जो रोज़ रात को अपने काम से फारिग हो कर यहां आते थे । 

अभी गुफ्तगू का सिलसिला शुरू हुआ था कि कुछ साथियों ने कहा चलिए तंदूरी चाय पी कर आते हैं। इन साथियों में फैसल, अब्दुल वहाब और जमाल थे। 

 पिछले एक महीने से या यूं कहें कि जब से ठंड शुरू हुई है हफ्ते में एक दो बार चाय पीने 7 किलो मीटर दूर इंटीग्रल यूनिवर्सिटी के मक़ाम पर पहुंच जाते थे। 

 आज भी इन लोगों ने प्लान बना रखा था। जैसे ही हम पहुंचे इन लोगों ने वही बात छेड़ दी और फिर प्लान के मुताबिक फैसल अपनी हुंडई एक्सेंट कार ले आया और हम निकल पड़े, अभी कुछ ही दूर पहुंचे थे कि इन लोगों का प्लान बदल गया और बोले भूख भी लगी है। ऐसा करते हैं 1090 चौराहे की तरफ़ चलते हैं। इन तीनों का मशवरा था तो हम ने भी हामी भर दी। 

 ठिठुरती ठंड में रात सांय सांय कर रही थी हम लोग अबरार नगर चौराहे से होते हुए सर्वोदय नगर वाले रस्ते पर पहुंचे। और वहां से गोमती बैराज पर । 

आज चूंकि साल 2024 का आखिरी दिन था तो ट्रैफिक रूट बदले हुए थे 1090 के रूट डायवर्ट कर दिया गया था तो हम लोग हजरतगंज चौराहे की तरफ़ मुड़ गए। 31 दिसंबर होने की वजह से जगह जगह ट्रैफिक जाम था। हजरतगंज चौराहे पर 15 मिनट तक हम लोग फंसे रहे । दाएं बाएं दुकानों पर खूब रौनक थी जगह जगह सजावट नज़र आ रही थी। लेकिन इस बार वो रौनक़ नहीं थी जो आम तौर पर नए साल के लिए होती है। 

 अब हम लोग धीरे धीरे परिवर्तन चौक होते हुए पुराने लखनऊ की तरफ़ निकल पड़े ।मेडिकल कॉलेज चौराहे से अकबरी गेट तक गाड़ियों की लंबी कतारें थीं । एक जगह हमने भी गाड़ी पार्क की और पैदल ही अकबरी गेट की तरफ़ चल पड़े।

 अकबरी गेट , चौक , चौपटिया, वगैरा ये सब पुराना लखनऊ कहलाता है और ये इलाका मुस्लिम अक्सरियत कहलाता है। रात के साढ़े दस बज चुके थे लेकिन भीड़ ऐसी थी जैसे हम बीच बाज़ार में खड़े हैं । इसकी एक बड़ी वजह ये है कि ये इलाका नॉनवेज फूड हब कहलाता है। इन गलियों में निकलते ही सोंधी सोंधी खाने खुशबू आप की भूक की शिद्दत को बढ़ा देगी । तंग रास्तों में इधर उधर खाने के लज़ीज़ होटल हैं जिन में कुछ मशहूर और कुछ नए नए खुले हैं। हम लोग रहीम की निहारी खाने के लिए बढ़ गए। 

कहा जाता है रहीम का होटल 19वीं सदी के आखिर में खुला था और अपने जायके की वजह से आज भी मशहूर है । हम चार लोग पहुंच गए रहीम के होटल जहां बेसमेंट में खाने का इंतजाम था। यहां हर टेबल पर लोग बैठे हुए थे और कुछ लोग खड़े थे जो जगह खाली होने का इंतज़ार कर रहे थे । 

 हम लोगों को भी थोड़े इंतज़ार के बाद एक टेबल मिली । फैसल के अलावा हम तीन पाए की निहारी खाने के शौक़ीन हैं लेकिन बदकिस्मती से आज पाए की निहारी ख़त्म हो गई थी। तो हम चारों लोगो ने गोश्त की निहारी का ऑर्डर दिया।

 थोड़े वक्फे के बाद चार निहारी और चार कुलचे के साथ हम लोगों का ऑर्डर सामने टेबल पर था। खाने के लिए बिस्मिल्लाह करने पर पता चला कि आज वो खुशबू ही नहीं है जो रहीम की निहारी की पहचान थी क्यूं कि हम जब भी इधर आते हैं तो ये निहारी खा कर जाते हैं इतनी पसंद है मुझको ये निहारी लेकिन आज की निहारी मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई जैसे तैसे एक कुलचे को पेट के तहखाने खाने भेजा और बाहर आ गए।

अब अब्दुल वहाब और जमाल की ख्वाहिश पर हम लोग घंटा घर की तरफ़ निकले। घंटा घर के पास जब पहुंचे तो रात के 11:10 हो रहे थे यानी रात को गुजरे तकरीबन 6 घंटे हो चुके थे लेकिन यहां की भीड़ अकबरी गेट से 3 गुना ज़्यादा थी । रोड के दोनों साइड दुकानें सजी हुई थी जिनमें ईरानी चाय,रहमान हलीम , चिकन कबाब,कश्मीरी चाय,तंदूरी चाय और चिकन फ्राइड काबिले ज़िक़्र है। हम लोगों ने एक जगह बैठ के चिकन स्टिक,चिकन लेग पीस,और चिकन बर्गर का ऑर्डर दिया अभी खा कर फ्री हुए ही थे कि अचानक शोर उठा और पटाखों की आवाज़ आने लगी फिर एक ज़ोरदार आवाज़ आई हैप्पी न्यू ईयर। हम लोग घंटा घर के सामने बने पक्के तालाब की तरफ़ बढ़ गए जहां सीढ़ियों पर कुछ नौजवान किसी गाने पर डांस कर रहे थे और एक दूसरे को साले नौ की मुबारक बाद पेश कर रहे थे । अब हम लोग थोड़ा आगे बढ़े जहां हम ने अपनी गाड़ी पार्क की थी । वहां पर कुछ नौजवान रील बना रहे थे और जम के डांस कर रहे थे। 

फैसल ने कहा शाहिद भाई ये सब अहले ईमान है । मैने कहा सारे अहले ईमान हों ये ज़रूरी तो नहीं तो उस ने कहा इन में से कई को मै जनता हूं। 

 इस बात पर अब्दुल वहाब ने कहा तालीम में हम इतने पीछे और इन सब बातों में इतने आगे कैसे ? 

 बहरहाल मुझे भी अफसोस हुआ कि इंसान अपनी जिंदगी के दिन कम होने पर कितनी खुशी ज़ाहिर कर रहा है। किसी नमालूम शायर का एक शेर मुझे उस वक़्त याद आया।। 

 एक और ईंट गिर गई दीवार ए हयात से 
 नादान कह रहे हैं नया साल मुबारक 

 आप हज़रात इस रात का मुशाहिदा मेरे YouTube चैनल PAINI NAZAR पर जाकर वीडियो की शक्ल में कर सकते हैं

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