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Barabanki: मैं मिनिस्टर कब हुआ था ?

 

Barabanki News... जिले में एक पार्टी खास के दो नेताओं की याददाश्त का चर्चा हमेशा होता रहता है। इऩ दोनों नेताओं के समर्थक, कार्यकर्ता या आम आदमी अकसर ये दुखरा रोया करते हैं हैं कि नेता जी हमें भूल जाते हैं, हमें पहचानते नहीं। सैंकड़ों दफा मिलने वालों की भी यही शिकायत रहती है कि नेता जी उन्हें पहचानते नहीं हैं। लोग तरह-तरह से इन दोनों नेताओं की याददाश्त का आंकलन करते हैं। कोई बताता है कि मगरूर हैं और कोई बता देता है कि जान-बूझकर ऐसा करते हैं। कई बार मिलने के बावजूद पहचान की समस्या को लेकर कभी-कभी लोग गुस्ता तक हो जाते हैं, लेकिन कुछ करने की हालत में नहीं होते। इन दो नेताओं में एक बुजुर्ग हो चुके हैं और एक अधेड़ हैं, लेकिन दोनों की याददाश्त के किस्से जिले में काफी मशहूर हैं। 

याददाश्त का एक मसला तो है, उम्र के साथ कम होती जाती है, लेेकिन ये सबके साथ हो ये भी मुमकिन नहीं है। सार्वजनिक जीवन में रहने वालों की अगर मेमोरी शार्प नहीं होती है, तो आलोचना होती ही है। शायद यही वजह है कि इन दोनों नेताओं की पीठ पीछे जमकर चर्चा होती है। पार्टी विशेष के एक नेता पर बुजुर्गी की वजह से याददाश्त पर खासा असर पड़ा है। कभी-कभी सार्वजनिक मंचों पर ये बुजुर्ग नेता काफी कुछ भूल जाते हैं। अभी हाल में सर सैयद डे के मौके पर बतौर मुख्य अतिथि कार्यक्रम को संबोधित करते हुए वो ये भूल गए कि वो मंत्री कब थे। तकरीर के बीच में बोलते-बोलते अचानक उनकी जुबान लड़खड़ाई और उन्होंने लोगों से पूछा, "मैं निनिस्टर कब रहा था?, मैं मिनिसटर कब हुआ था" कार्यक्रम में लोगों ने बताया कि 2012 से 2017 तक। इसके बाद उन्होंने अपनी तमाम उपलब्धियों का बखान किया। एक-एक करके ये भी बताया दिया कि किसको अपनी निधि से क्या-क्या दिया है। 

दरअसल जो लोग बुजुर्ग नेता की याददाश्त को लेकर आलोचना या विरोध करते हैं। इस घटना से उन्हें कुछ सबक लेना चाहिए। इस बात से ये मान लेना चाहिए कि नेता जी की याददाश्त पर बुजुर्गी का ही असर है। इसकी वजह ये है कि जो शख्स अपने सियासी जिंदगी की सबसे बड़ी बुलंदी को भूल सकता है, मंत्री के तौर पर उस हसीन वक्त को भूल सकता है, तो उनकी याददाश्त कमजोरी होने की दूसरी वजहों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए। सुझाव यही है कि लोगों को इस हकीकत को मान लेना चाहिए और हर बार खुद को पहचनवाते रहना चाहिए, क्योंकि इसके लिए उनके पास और कोई दूसरा विकल्प नहीं है और आगे उन्हें लंबे समय तक जिले के सियासी मैदान में जमे रहना है। भले ही लोग उनके खिलाफ मोर्चा खेलते रहें।

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