-राम पुनियानी
कुछ दिन पहले (1 अक्टूबर को) बरेली की एक अदालत ने यौन हिंसा के एक मामले में एक मुस्लिम युवक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई. अपने फैसले में न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यह लव जिहाद का मामला है और पुलिस इसे उस स्वरूप में प्रस्तुत करने में असफल रही है. इस मामले में लड़की हिंदू थी. मुकदमे की कार्यवाही के दौरान लड़की ने यह कहते हुए अपनी शिकायत वापस ले ली थी कि उसे हिंदुत्ववादी संगठनों के दबाव के चलते झूठी शिकायत दर्ज करवानी पड़ी थी. न्यायाधीश ने फैसले में यह टिप्पणी भी की कि “मुस्लिम पुरूष, हिंदू महिलाओं से शादी करने के उद्धेश्य से उन्हें निशाना बनाते हैं.”
फैसले में आगे कहा गया:
“कुल मिलाकर, मुस्लिम पुरुषों द्वारा गैर-मुस्लिम समुदायों की महिलाओं से प्यार का नाटक कर उनसे विवाह करना और उनका धर्मपरिवर्तन करवाना लव जिहाद है. एक धर्म विशेष के अराजकतावादी तत्व, लव जिहाद के माध्यम से गैर-कानूनी धर्मपरिवर्तन करवाते हैं. उनसे यह सब या तो कोई करवाता है या वे स्वयं यह साजिश रचते हैं...लव जिहाद के लिए बहुत धन की जरूरत होती है. इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके लिए विदेशी धन का इस्तेमाल किया जा रहा हो...”. लव जिहाद के लिए विदेशी धन का इस्तेमाल एक नया शिगूफा है. बेहतर होता कि जज साहब यह भी बता देते कि इसके लिए धन किस देश से आ रहा है.
लव जिहाद से जुड़ा प्रोपेगेंडा, जिहाद सीरीज का पहला एपीसोड था. अब कई प्रकार के जिहादों की चर्चा आम हो चुकी है जिनमें लव जिहाद के अलावा यूपीएससी जिहाद, फ्लड जिहाद, कोरोना जिहाद आदि शामिल हैं. कुछ घोर साम्प्रदायिक एंकरों को जिहादों की सूची को लम्बा करने में महारत हासिल है. वे मुसलमानों को हर चीज़ से जोड़ने में सिद्धहस्त हैं - चाहे वो बाढ़ हो या कोई बीमारी. यह छोटे-छोटे मुद्दों को तिल से ताड़ बनाकर एक ऐसे धार्मिक समुदाय, जिसका धर्म ‘विदेशी’ बताया जाता है, का दानवीकरण करने का मामला है. इस समुदाय को ‘पराया’ और ‘दुश्मन’ बताया जाता है और खुलेआम भी और दबे-छिपे तरीकों से भी उस पर हमले किए जाते हैं. यह ‘पराए’ और ‘दुश्मन’ वाला नजरिया ही साम्प्रदायिक राजनीति और हिंदू राष्ट्रवादी राजनीति की जड़ में है, जिसका इस समय भारतीय समाज में बोलबाला है.
लव जिहाद संबंधी प्रोपेगेंडा बहुत पुराना नहीं है. कुछ दशक पहले केरल के कुछ ईसाई बिशपों ने यह मिथ्या आरोप पहली बार लगाया और जल्दी ही इसे हिन्दू राष्ट्रवादियों ने बड़े पैमाने पर फैलाना शुरू कर दिया. शाखाओं, उसके द्वारा संचालित स्कूलों, मीडिया और सोशल मीडिया के एक हिस्से और आईटी सेलों के कारण आरएसएस की प्रोपेगेंडा फैलाने की क्षमता बहुत अधिक है. जांच के पश्चात यह गलत पाया गया कि कोई ऐसा संगठन है जो हिंदू लड़कियों को फंसाने के लिए मुस्लिम युवकों को धन उपलब्ध करवाता है.
लव जिहाद का उद्धेश्य क्या है, इसे लेकर कई प्रकार की बातें की जाती है. पहला उद्धेश्य बताया जाता है देश की जनसंख्या में विभिन्न धर्मों के अनुपात में बदलाव करना. अभी तक जो प्रोपगेंडा बड़े पैमाने पर किया जाता था वह था कि मुसलमानों की ‘चार बीबियां और चालीस बच्चे’ होते हैं और जल्दी ही उनकी आबादी हिंदुओं से अधिक हो जाएगी. अब लव जिहाद और उसके जरिए हिंदू लड़कियों का धर्मपरिवर्तन करना और बच्चे पैदा करना इसमें जुड़ गया है. इसमें अब यह बात भी जोड़ दी गई है कि इन लड़कियों को इस तरह का प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि उन्हें इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों की फौज में शामिल किया जा सके.
लव जिहाद के प्रोपेगेंडा का मुख्य पहलू है उसका पितृसत्तात्मक मूल्यों से जुड़ाव. पितृसत्तात्मकता और धर्म-आधारित राष्ट्रवाद का चोली-दामन का साथ है. देश में साम्प्रदायिक राजनीति के प्रबल होने के साथ-साथ महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहे हैं और साथ ही बलात्कार की घटनाएँ भी. तीस्ता सीतलवाड के अनुसार, “जिन समुदायों को हमलों का निशाना बनाया जाता है उनकी महिलाओं को उन समुदायों के ‘सम्मान का प्रतीक’ मानकर खासतौर पर घृणा और हिंसा का शिकार बनाया जाता है. हमने यह विभाजनकाल की हिंसा में 1946-47 में देखा, असम के नेल्ली में 1983 में देखा, दिल्ली में 1984 में देखा, बंबई में 1992-93 और गुजरात में 2002 में देखा. हाल में, 2023 में हमने यही मणिपुर में देखा. इसकी वजहें समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक और वैचारिक हैं. हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि भाजपा पर उसकी विचारधारात्मक पितृ संस्थाओं आरएसएस और हिंदू महासभा का नियंत्रण है - जो अति दक्षिणपंथी संगठन हैं. वे धर्म का सैन्यीकरण करना चाहते हैं और महिलाओं और उनकी लैंगिकता पर नियंत्रण चाहते हैं.”
यहां हिंदू राष्ट्रवाद के शीर्षस्थ विचारक विनायक दामोदर सावरकर द्वारा की गई शिवाजी की निंदा का जिक्र प्रासंगिक होगा. शिवाजी की सेना द्वारा लूटपाट के दौरान बंदी बनाई कल्याण के मुस्लिम गवर्नर की बहू को उनके सामने पेश किया गया और शिवाजी ने उसे ससम्मान वापिस भेजने का आदेश दिया. सावरकर ने शिवाजी द्वारा उसे इंतकाम का निशाना न बनाने और वापिस भेजने के निर्णय की आलोचना की.
‘लव जिहाद’ के बढ़ते शोर-शराबे के बीच इतिहासकार चारू गुप्ता का कहना है कि यह महिलाओं के जीवन पर नियंत्रण रखने का तंत्र है. “हिंदू दक्षिणपंथियों के इस झूठे दावे कि लव जिहाद फैलाने वाला संगठन हैं जो हिंदू महिलाओं को इस्लाम अपनाने के लिए बाध्य करने के उद्धेश्य से प्रेम का झूठा प्रपंच रचते हैं, सन् 1920 में तथाकथित अपहरणों को लेकर किए गए प्रचार जैसा ही है. 1920 हो या 2009, हिंदू पितृसत्तात्मक नजरिया इन अभियानों के साथ बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है. मुस्लिमों द्वारा सताई गई असहाय हिंदू महिलाओं की छवि बड़े पैमाने पर प्रस्तुत की जाती है और महिलाओं के अपनी मर्जी से फैसला करने के वैध अधिकार को नजरअंदाज किया जाता है.”
इन बातों को ध्यान में रखते हुए ही बजरंग दल की रक्षा बंधन जैसे अवसरों पर दिखाई जाने वाली अतिसक्रियता को देखा जाना चाहिए जब वे हिंदुओं के घरों पर जाते हैं और अभिभावकों को अपनी बेटियों पर ‘नजर रखने’ की ताकीद देते हैं. इस प्रोपेगेंडा का असर हो रहा है और समाज के विभिन्न वर्गों पर इसका प्रभाव पड़ रहा है. मुस्लिम युवकों पर हमलों के कई मामले सामने आ रहे हैं. प्रियंका टोडी और रिजवान खान के प्रकरण का पटाक्षेप रिजवान खान की त्रासद मृत्यु के साथ हुआ. कई मामलों में इसका ठीक उलट भी होता है जैसे अंकित भंडारी की हत्या उस मुस्लिम लड़की के रिश्तेदारों द्वारा कर दी गई जिससे वह प्यार करता था.
हादिया के मामले, जिसमें अखिला अरूना ने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम ग्रहण कर लिया था, से कई खुलासे होते हैं. उसने अपने मुस्लिम मित्रों से हुई चर्चाओं की वजह से इस्लाम अपनाया. इसके बाद उसने शफीक जहाँ से विवाह किया. अदालत ने उसे इस आधार पर उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया कि उसका ब्रेन वॉश कर दिया गया है और उसे आईसिस में शामिल कर लिया जाएगा. उसने सर्वोच्च न्यायालय तक अपील की जिसने उसका बयान सुनने के बाद उसका पति के साथ रहने का अधिकार पुनःस्थापित किया.
केरल में कई योग केन्द्र खुल गए हैं जो मुसलमानों से विवाह का मन बना चुकी हिंदू लड़कियों को अपना निर्णय बदलने, दुबारा हिंदू धर्म अपनाने और मुस्लिम पुरूष के प्रति प्यार का परित्याग करने के लिए राजी करने का प्रयास करते हैं. कई लड़कियों ने इन केन्द्रों में जोरजबरदस्ती और ब्लेकमेलिंग किए जाने की शिकायत की है.
ऊपर जिस अदालती फैसले का जिक्र किया गया है, वह दिखाता है कि यह प्रोपेगेंडा न्यायाधीशों सहित समग्र रूप से हमारे समाज पर किस तरह का प्रभाव डाल रहा है. कम से कम न्यायाधीशों से तो यह अपेक्षा की ही जा सकती है कि उनके फैसले ठोस तथ्यों पर आधारित हों.
(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया. लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं)
ये लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। बाराबंकी मिरर पूर्णता सहमति या असहमति व्यक्त नहीं करता है।
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RAM PUNIYANI
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